देशभर के शिक्षकों ने एक बार फिर अपनी आवाज बुलंद कर दी है। इस बार मुद्दा है शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता, जिसे लेकर उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के शिक्षक दिल्ली में एकत्र हुए और जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध खासतौर पर उन शिक्षकों का है, जिन्हें वर्षों पहले नियुक्त किया गया था और अब उन्हें दोबारा परीक्षा देने के लिए कहा जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद अब यह अनिवार्य कर दिया गया है कि 2011 से पहले नियुक्त सभी शिक्षकों को भी TET परीक्षा पास करनी होगी। यदि वे इस परीक्षा को पास नहीं करते हैं, तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है।
इस फैसले के विरोध में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा समेत कई राज्यों के शिक्षक बड़ी संख्या में दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचे और प्रदर्शन किया।
क्यों नाराज हैं शिक्षक?
शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने अपनी नियुक्ति के समय सभी नियमों का पालन किया था। उस समय TET अनिवार्य नहीं था, इसलिए अब अचानक यह नियम लागू करना उनके साथ अन्याय है।
कई शिक्षकों ने सवाल उठाया कि:
- 50-55 साल की उम्र में दोबारा परीक्षा देना कितना व्यावहारिक है?
- वर्षों से पढ़ा रहे अनुभवी शिक्षकों की योग्यता पर सवाल क्यों?
- क्या पुराने नियमों के तहत नियुक्ति पाने वाले शिक्षकों को छूट नहीं मिलनी चाहिए?
शिक्षकों का मानना है कि यह फैसला उनके सम्मान और नौकरी दोनों पर सीधा हमला है।
दिल्ली में बड़ा प्रदर्शन
दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित इस प्रदर्शन में हजारों शिक्षकों ने हिस्सा लिया। यह प्रदर्शन Teachers Federation of India (TFI) के बैनर तले आयोजित किया गया था, जिसमें देशभर के शिक्षक संगठनों ने भाग लिया।
प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने केंद्र सरकार से मांग की कि:
- TET को पुराने शिक्षकों के लिए अनिवार्य न किया जाए
- इस फैसले को रोकने के लिए नया कानून बनाया जाए
- शिक्षा नीति में ऐसे बदलाव न किए जाएं जो नौकरी की सुरक्षा को कमजोर करें
कितने शिक्षकों पर असर?
- इस फैसले का असर बहुत बड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार:
- पूरे देश में लगभग 20 लाख शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं
- सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही करीब 1.8–2 लाख शिक्षक इस दायरे में आते हैं
- यदि ये शिक्षक TET पास नहीं कर पाते, तो उनकी नौकरी पर संकट आ सकता है।
शिक्षकों की प्रमुख मांगें
प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों ने सरकार के सामने कई अहम मांगें रखी हैं:
- 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को TET से छूट दी जाए
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संशोधित करने के लिए अध्यादेश लाया जाए
- पुराने शिक्षकों को परीक्षा के बजाय प्रशिक्षण (Training) दिया जाए
- नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए
क्या कह रहे हैं शिक्षक नेता?
शिक्षक संगठनों के नेताओं का कहना है कि यह फैसला “खेल के बीच में नियम बदलने” जैसा है। उनका मानना है कि सरकार को अनुभवी शिक्षकों की सेवा का सम्मान करना चाहिए, न कि उन्हें नई परीक्षा के दबाव में डालना चाहिए।
कुछ नेताओं ने यह भी चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
आगे क्या हो सकता है?
इस पूरे मामले पर अब सरकार की प्रतिक्रिया अहम होगी। शिक्षकों की मांग है कि संसद में कानून बनाकर इस आदेश को रोका जाए। वहीं, सरकार और शिक्षा विभाग इस मुद्दे पर विचार कर सकते हैं।
संभावना है कि:
- इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच बातचीत हो
- कानूनी स्तर पर समाधान निकाला जाए या फिर आंदोलन और तेज हो सकता है
यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह आंदोलन आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है।